Why the Dollar is the Global Currency

यू्क्रेन पर हमला कर रूस को आखिर हासिल क्या हुआ? जंग में हर दिन गई 57 की जान

रूस और यूक्रेन के बीच चल रही जंग के 306 दिन पूरे हो गए हैं। संयुक्त राष्ट्र की संस्था ऑफिस ऑफ द हाई कमीश्नर (ओएचसीएचआर) के अनुसार जंग में अबतक यूक्रेन के 17,595 लोग अपनी जान गंवा बैठे हैं। इस अनुसार बीते 306 दिनों में रूसी सेना के हाथों हर दिन 57 लोगों की जान गई है। युद्ध में मारे गए स्थानीय लोगों की संख्या करीब 6826 हैं। कीव स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (केएसई) के अनुसार सितंबर 2022 तक यूक्रेन की अर्थव्यवस्था को कुल करीब 12,700 करोड़ डॉलर की क्षति हुई है, जिसकी भरपाई में लंबा वक्त लग सकता है।

विश्व बैंक के अनुसार यूक्रेन की अर्थव्यवस्था इस साल 35 फीसदी तक सिकुड़ी है। यूक्रेन को दोबारा संवारने के लिए 34,900 करोड़ डॉलर की जरूरत होगी। ये रकम युद्ध से पहले यूक्रेन की अर्थव्यवस्था के डेढ़ गुना के बराबर है। ऑर्गनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट (ओईसीडी) के अनुसार दो देशों की लड़ाई में दुनिया की अर्थव्यवस्था भी चोटिल हुई है। युद्ध से पहले वैश्विक अर्थव्यवस्थ को 3.1 फीसदी की दर से विकास करना था जो घटकर 2.2 फीसदी हो गई है।

रूस को आखिर हासिल क्या हुआ?

इंस्टीट्यूट फॉर द स्टडी ऑफ वॉर (आईएसडब्ल्यू) के अनुसार 300 दिन के युद्ध में रूस ने चार शहरों में अपना कब्जा जमाया है। इसमें खेरसॉन, दोनेत्सक, लुहांस्क और जेपोरिजिया के कुछ हिस्सों में रूसी सेना का कब्जा है। कोई भी शहर पूर्ण रूप से रूसी सेना के कब्जे में नहीं है। यूक्रेन की सेना ने हाल ही में खेरसॉन का एक बड़ा क्षेत्र दोबारा अपने कब्जे में ले लिया है।

78.3 लाख लोग अपना घर छोड़ भागे

जंग के भयावह हालात के बीच यूक्रेन से 78.3 लाख लोग अपना घर-बार छोड़कर भाग गए हैं। वहीं 65 लाख लोग अपना सबकुछ छोड़कर यूक्रेन में ही नया ठिकाना बना चुके हैं। यही नहीं 437 बच्चे की जान युद्ध में चली गई है। युद्ध के भयावह मंजर को देखने वाले लाखों बच्चे मानसिक तनाव से गुजर रहे हैं।

बिना बिजली पानी के लाखों लोग

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार युद्धग्रस्त यूक्रेन में एक करोड़ से अधिक लोगों को आधी अधूरी बिजली, पानी अस्पताल जैसी सुविधा मिल रही है। लाखों लोग ऐसे हैं जो बिना बिजली के जीवन जी रहे हैं। यही नहीं लाखों की संख्या में बच्चे ऐसे हैं जिनको जरूरत के अनुसार खाना तक नहीं मिल पा रहा है।

बमबारी में 1.35 लाख भवन तबाह

केएसई के अनुसार रूस की सैन्य कार्रवाई में सबसे ज्यादा नुकसान यूक्रेन की बहुमंजिला इमारतों को हुआ है। रूस की बमबारी से पूरे यूक्रेन में 1.35 लाख भवन पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गए हैं। अगर इन्होंने दोबारा बनाया जाए तो 5050 करोड़ डॉलर का खर्च आएगा।

प्रतिबंधों से रूस पर चौतरफा हमला

अमेरिका समेत यूरोपीय देशों ने प्रतिबंधों से रूस पर चौतरफा हमला किया। उद्योगपतियों, आयात- निर्यात के साथ तेल और गैस आपूर्ति पर प्रतिबंधों से अर्थव्यवस्था डोली। महंगाई दर 14 फीसदी है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का अनुमान है कि 2023 में भी यही हाल रहेगा।

यूरोपीय देशों को भी नुकसान हुआ

अमेरिका समेत यूरोपीय देशों ने जब रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाना शुरू किया तो उसका नुकसान उन्हें भी हुआ। ब्रिटेन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों की सूची में एक अंक नीचे गिर गया। अमेरिका के साथ फ्रांस और जर्मनी समेत अन्य यूरोपीय देशों में ऊर्जा संकट के हालात आज भी हैं।

दो देशों की लड़ाई में बंटती दिखी दुनिया

रूस और यूक्रेन के बीच जंग शुरू हुई तो दुनिया दो हिस्सों में बंट गई। अमेरिका और यूरोपीय देश एकजुट होकर सामने आए। वहीं चीन, पाकिस्तान समेत कई देश रूस के साथ खड़े नजर आए। अमेरिका यूक्रेन की पूरी मदद कर रहा है और नाटो सेनाएं यूक्रेन सीमा पर उसकी पूरी मदद कर रही हैं।

जानिए क्यों है ये चिंता का कारण? भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगातार घट रहा

भारतीय रिजर्व बैंक के ताजा आंकड़ों के अनुसार भारत का विदेशी मुद्रा भंडार आठ जुलाई को समाप्त हुए सप्ताह में 8.062 अरब डॉलर घटकर 15 महीनों के सबसे निचले स्तर 580.252 अरब डॉलर पर आ गया है। आरबीआई की ओर से जारी साप्ताहिक आंकड़ों से पता चलता है कि फॉरेन करेंसी असेट्स (एफसीए) में गिरावट के कारण विदेशी मुद्रा भंडार में कमी आई है। एफसीए, स्वर्ण भंडार और पूरे विदेशी मुद्रा भंडार का प्रमुख हिस्सा है।

बीते हफ्ते में एफसीए 6.656 अरब डॉलर घटकर 518.09 अरब डॉलर रह गया है। एफसीए में विदेशी मुद्रा भंडार में रखे गए यूरो, पाउंड और येन जैसी गैर अमेरिकी करेंसी का बढ़ना या गिराना दोनों का असर शामिल है। वहीं इस दौरान सोने का भंडार 1.236 अरब डॉलर गिरकर 39.186 अरब डॉलर पर आ गया है। वहीं बीते हफ्ते में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के साथ स्पेशल ड्राइंग राइट्स (SDR) 122 मिलियन डॉलर घटकर 18.012 बिलियन डॉलर रह गया है।

आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक आठ जुलाई को समाप्त हफ्ते के दौरान देश की आईएमएफ की रिजर्व पोजिशन 49 मिलियन डॉलर घटकर 4.966 बिलियन डॉलर रह गई है। एक जुलाई को समाप्त हफ्ते के दौरान यह भंडार 5.008 अरब डॉलर कम होकर 588.314 अरब डॉलर हो गया था। विदेशी मुद्रा भंडार में यह गिरावट ऐसे समय में दर्ज की गई है जब भारतीय रुपया कमजोर होकर अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। भारतीय रुपया फिलहाल फिसलते हुए डॉलर के मुकाबले लगभग 80 रुपये प्रति डॉलर के पास पहुंच गया है।

देश के विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट की खबरों के बाद यह जान लेना अहम हो जाता है कि आखिर यह विदेशी मुद्रा भंडार है क्या? अगर विदेशी मुद्रा भंडार में कमी हो रही तो इसका देश की अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ने वाला है? दरअसल, भारत की बात करें तो हमारे देश का विदेशी मुद्रा भंडार केंद्रीय बैंक रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पास रखी गई धनराशि और परिसंपत्तियां हैं। इनमें विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां (FCA), स्वर्ण भंडार, विशेष आहरण अधिकार (SDR) और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के साथ रिजर्व ट्रेंच शामिल होती हैं। अगर देश को जरूरत होती है तो वह विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल कर अपने विदेशी ऋण का भुगतान कर सकता है।

देश में विदेशी मुद्रा भंडार के कम होने का असर सबसे पहला असर रुपये की मजबूती पर पड़ता है, जैसे-जैसे विदेशी मुद्रा भंडार घटने लगता है रुपये की कीमत कम होती जाती है। हमने हाल के दिनों में देखा है कि रुपये की कीमत लगातार गिरती जा रही है। शुक्रवार को भारतीय रुपये की कीमत डॉलर के मुकाबले गिरकर 79.72 रुपये प्रति डॉलर रह गई है।

आपको बता दें कि देश में जैसे-जैसे रुपये की कीमत कम होती जाती है देश का आयात मूल्य बढ़ने लगता है और निर्यात मूल्य घटने लगता है। ऐसी स्थिति में देश का व्यापार घाटा बढ़ने लगता है। हमारा देश बीते कुछ महीनों से इस स्थिति का सामना कर रहा है। बीते जून महीने में व्यापार घाटा बढ़कर अब तक के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचकर 25.6 अरब डॉलर हो गया है।

व्यापार घाटा को कम करने की कवायद के तहत ही रिजर्व बैंक ने बीते सोमवार (11 जुलाई) को विदेश व्यापार रुपये में करने की भी सुविधा दे दी है। इसका इस्तेमाल कर वर्तमान परिस्थितियों में रूस और श्रीलंका जैसे देशों के साथ व्यापार किया जा सकता है, जिससे रुपये को थोड़ी राहत मिल सकती है। आपको बता दें कि भारत सबसे ज्यादा कच्चे तेल का आयात करता है और रूस तेल का सबसे बड़ा निर्यातक देश है। अगर दोनों देशों के बीच रुपये में कारोबार शुरू होता है तो इससे रुपये को मजबूत बनाने में काफी मदद मिलेगी।

देश में जैसे-जैसे विदेशी मुद्रा का भंडार बढ़ता है रुपया मजबूत होता जाता है। इससे देश आर्थिक रूप से समृद्ध होता जाता और रुपये की कीमत में स्थिरता बनी रहती है। विदेशी रुपया भंडार बढ़ने से रुपये में आई मजबूती का फायदा विदेशों में निवेश करने वाले कारोबारियों पर भी पड़ता है। ऐसा होने से उन्हें अपनी मुद्रा का कम से कम निवेश करना पड़ता है।

Indian currency – 1914 में छपा था पहला डॉलर, जानें क्‍या है दुनिया की सबसे ताकतवर करेंसी का इतिहास

Indian currency - 1914 में छपा था पहला डॉलर, जानें क्‍या है दुनिया की सबसे ताकतवर करेंसी का इतिहास

Indian currency – डॉलर को वर्तमान में दुनिया की सबसे मजबूत मुद्रा माना जाता है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि हर देश की अलग-अलग करेंसी होती है। लेकिन दुनिया को व्यापार करने के लिए एक मुद्रा की जरूरत थी। डॉलर में किया जाता है।

डॉलर के मुकाबले Indian currency भारतीय मुद्रा अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई। मंगलवार को बाजार खुला तो 1 डॉलर 80 रुपये के ऊपर चढ़ गया. संयोग से अगर आप ग्राफ देखें तो इस साल डॉलर के मुकाबले रुपये में 7 फीसदी से ज्यादा की गिरावट आई है.

रुपये में बड़ी गिरावट की आशंका जताई जा रही है, क्योंकि अमेरिकी मुद्रा इस समय यूरो से पीछे चल रही है। अपने जन्म के बाद यह पहली बार है जब यूरो ने डॉलर को पछाड़ दिया है। ऐसे में वैश्विक बाजार रुपये को लेकर ज्यादा आशावादी नहीं है।

डॉलर को वर्तमान में दुनिया की सबसे मजबूत मुद्रा माना जाता है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि हर देश की अलग-अलग करेंसी होती है। लेकिन दुनिया को व्यापार करने के लिए एक मुद्रा की जरूरत थी।

डॉलर में किया जाता है। इस मामले में, प्रत्येक देश के पास डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार होता है, Indian currency जिसका उपयोग वे उन वस्तुओं के आयात के लिए करते हैं जिनकी देश को आवश्यकता होती है।

इन सभी खेलों में अमेरिका को सबसे ज्यादा फायदा होता है, क्योंकि वह अपने डॉलर से किसी भी देश से अपनी जरूरत की कोई भी चीज खरीद सकता है। उसे बस इतना करना है कि अपनी जरूरतों के लिए कुछ अतिरिक्त डॉलर प्रिंट करें।

अमेरिका की मुद्रा की मजबूती का एक लंबा इतिहास रहा है। डॉलर पहली बार 1914 में छपा था। फेडरल रिजर्व को संघीय कानून द्वारा संयुक्त राज्य में केंद्रीय बैंक के रूप में स्थापित किया गया है। Indian currency 1 साल बाद सिक्कों की छपाई शुरू हुई। फेडरल बैंक ने एंड्रयू जैक्सन की तस्वीर के साथ पहला $ 10 का नोट जारी किया। तीन दशक बाद, डॉलर आधिकारिक तौर पर दुनिया की आरक्षित मुद्रा बन गया।

एक रिपोर्ट के अनुसार, प्रथम विश्व युद्ध के दौरान मित्र राष्ट्रों ने अमेरिकी आपूर्ति के बदले में सोने का भुगतान किया। अमेरिका तब सबसे बड़ा सोने का भंडारण करने वाला देश बन गया। जब युद्ध समाप्त हुआ, तो देशों ने सोने के मानक को समाप्त करने के लिए अपनी मुद्राओं को डॉलर के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।

अमेरिका में पहली कागजी मुद्रा का इस्तेमाल 1690 में किया गया था, जब मैसाचुसेट्स बे कॉलोनी ने औपनिवेशिक नोट जारी किए थे। इन नोटों का इस्तेमाल सैन्य अभियानों के लिए फंडिंग के लिए किया जाता था। संयुक्त राज्य अमेरिका ने आधिकारिक तौर पर 1785 में डॉलर के प्रतीक को अपनाया। तब से यह लगातार ट्रेंड कर रहा है।

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के अनुसार, सभी विदेशी बैंकों के मुद्रा भंडार का 59 प्रतिशत अमेरिकी डॉलर में है। लेकिन इस अमेरिकी मुद्रा की मजबूत स्थिति के बावजूद एक आश्चर्यजनक तथ्य यह भी है कि डॉलर दुनिया की सबसे मजबूत मुद्रा नहीं है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह विश्व मुद्रा सूची में दसवें नंबर पर है। इस लिस्ट में कुवैती दीनार पहले नंबर पर है। लेकिन फिर भी डॉलर के अलावा कुछ नहीं।

एक डॉलर की कीमत 80 रुपये पर पहुंची, जानें- क्यों कमजोर होता जा रहा है रुपया, अभी और कितनी गिरावट बाकी?

Rupee Vs Dollar: एक डॉलर की कीमत 80 रुपये पर पहुंच गई है. संसद में सवालों के जवाब में केंद्र सरकार की तरफ से जवाब दिया गया है कि 2014 के बाद से डॉलर के मुकाबले रुपये में अभी तक 25 फीसदी की गिरावट दर्ज की गयी है.

Updated: July 19, 2022 12:44 PM IST

Dollar Vs Rupee

Rupee Vs Dollar: मंगलवार को शुरुआती कारोबार में भारतीय रुपया मनोवैज्ञानिक रूप से महत्वपूर्ण विनिमय दर के स्तर डॉलर के मुकाबले 80 रुपये के स्तर से नीचे चला गया. ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, रुपया घटकर 80.06 प्रति डॉलर पर आ गया.

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रुपया विनिमय दर क्या है?

अमेरिकी डॉलर की तुलना में रुपये की विनिमय दर अनिवार्य रूप से एक अमेरिकी डॉलर को खरीदने के लिए आवश्यक रुपये की संख्या है. यह न केवल अमेरिकी सामान खरीदने के लिए बल्कि अन्य वस्तुओं और सेवाओं (जैसे कच्चा तेल) की पूरी मेजबानी के लिए एक महत्वपूर्ण मीट्रिक है, जिसके लिए भारतीय नागरिकों और कंपनियों को डॉलर की आवश्यकता होती है.

जब रुपये का अवमूल्यन होता है, तो भारत के बाहर से कुछ खरीदना (आयात करना) महंगा हो जाता है. इसी तर्क से, यदि कोई शेष विश्व (विशेषकर अमेरिका) को माल और सेवाओं को बेचने (निर्यात) करने की कोशिश कर रहा है, तो गिरता हुआ रुपया भारत के उत्पादों को और अधिक प्रतिस्पर्धी बनाता है, क्योंकि रुपये का अवमूल्य विदेशियों के लिए भारतीय उत्पादों को खरीदना सस्ता बनाता है.

डॉलर के मुकाबले रुपया क्यों कमजोर हो रहा है?

सीधे शब्दों में कहें तो डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर हो रहा है, क्योंकि बाजार में रुपये की तुलना में डॉलर की मांग ज्यादा है. रुपये की तुलना में डॉलर की बढ़ी हुई मांग, दो कारकों के कारण बढ़ रही है.

पहला यह कि भारतीय जितना निर्यात करते हैं, उससे अधिक वस्तुओं और सेवाओं का आयात करते हैं. इसे ही करेंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) कहा आख़िर डॉलर कैसे बना दुनिया की सबसे मज़बूत मुद्रा जाता है. जब किसी देश के पास यह होता है, तो इसका तात्पर्य है कि जो आ रहा है उससे अधिक विदेशी मुद्रा (विशेषकर डॉलर) भारत से बाहर निकल रही है.

2022 की शुरुआत के बाद से, जैसा कि यूक्रेन में युद्ध के मद्देनजर कच्चे तेल और अन्य कमोडिटीज की कीमतों में बढ़ोतरी होने लगी है, जिसकी वजह से भारत का सीएडी तेजी से बढ़ा है. इसने रुपये में अवमूल्यन यानी डॉलर के मुकाबले मूल्य कम करने का दबाव डाला है. देश के बाहर से सामान आयात करने के लिए भारतीय ज्यादा डॉलर की मांग कर रहे हैं.

दूसरा, भारतीय अर्थव्यवस्था में निवेश में गिरावट दर्ज की गयी है. ऐतिहासिक रूप से, भारत के साथ-साथ अधिकांश विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में CAD की प्रवृत्ति होती है. लेकिन भारत के मामले में, यह घाटा देश में निवेश करने के लिए जल्दबाजी करने वाले विदेशी निवेशकों द्वारा पूरा नहीं किया गया था; इसे कैपिटल अकाउंट सरप्लस भी कहा जाता है. इस अधिशेष ने अरबों डॉलर लाए और यह सुनिश्चित किया कि रुपये (डॉलर के सापेक्ष) की मांग मजबूत बनी रहे.

लेकिन 2022 की शुरुआत के बाद से, अधिक से अधिक विदेशी निवेशक भारतीय बाजारों से पैसा निकाल रहे हैं. ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि भारत की तुलना में अमेरिका में ब्याज दरें बहुत तेजी से बढ़ रही हैं. अमेरिका में ऐतिहासिक रूप से उच्च मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए अमेरिकी केंद्रीय बैंक आक्रामक रूप से ब्याज दरों में वृद्धि कर रहा है. निवेश में इस गिरावट ने भारतीय शेयर बाजारों में निवेश करने के इच्छुक निवेशकों के बीच भारतीय रुपये की मांग में तेजी से कमी की है.

इन दोनों प्रवृत्तियों का परिणाम यह है कि डॉलर के सापेक्ष रुपये की मांग में तेजी से गिरावट दर्ज की गयी है. यही वजह है कि डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर हो रहा है.

क्या डॉलर के मुकाबले केवल रुपये में ही आई है गिरावट?

यूरो और जापानी येन समेत सभी मुद्राओं के मुकाबले डॉलर मजबूत हो रहा है. दरअसल, यूरो जैसी कई मुद्राओं के मुकाबले रुपये में तेजी आयी है.

क्या रुपया सुरक्षित क्षेत्र में है?

रुपये की विनिमय दर को “प्रबंधित” करने में आरबीआई की भूमिका को समझना महत्वपूर्ण है. यदि विनिमय दर पूरी तरह से बाजार द्वारा निर्धारित की जाती है, तो इसमें तेजी से उतार-चढ़ाव होता है – जब रुपया मजबूत होता है और रुपये का अवमूल्यन होता है.

लेकिन आरबीआई रुपये की विनिमय दर में तेज उतार-चढ़ाव की अनुमति नहीं देता है. यह गिरावट को कम करने या वृद्धि को सीमित करने के लिए हस्तक्षेप करता है. यह बाजार में डॉलर बेचकर गिरावट को रोकने की कोशिश करता है. यह एक ऐसा कदम है जो डॉलर की तुलना में रुपये की मांग के बीच के अंतर को कम करता है. जिससे भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट आती है. जब आरबीआई रुपये को मजबूत होने से रोकना चाहता है तो वह बाजार से अतिरिक्त डॉलर निकाल लेता है, जिससे भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में बढ़ोतरी होती है.

एक डॉलर आख़िर डॉलर कैसे बना दुनिया की सबसे मज़बूत मुद्रा की कीमत 80 रुपये से ज्यादा होने के बाद यह कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या रुपये में और गिरावट आनी बाकी है? जानकारों का मानना है कि 80 रुपये का स्तर एक मनोवैज्ञानिक स्तर था. अब इससे नीचे आने के बाद यह 82 डॉलर तक पहुंच सकता है.

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आख़िर डॉलर क्यों है ग्लोबल करेंसी?

जैसा की हम सभी जानते है कि इन दिनों भारत की करेंसी रुपया अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर आ गई है इसे पहले आज तक रुपया डॉलर के मुकाबले कभी इतना कमजोर नहीं हुआ। आज एक रुपये की कीमत 75 डॉलर हो गई है। हालांकि सिर्फ भारत ही नहीं दुनियाभर की कई करेंसी डॉलर के मुकाबले गिरी है जिसका एक मुख्य कारण तेल की बढ़ती कीमत और विश्व बाजार की स्थिति है।

लेकिन आज हम इस बारे में बात नहीं करने वाले है कि रुपया क्यों कमजोर हो रहा है या विश्व बाजार में ऐसी स्थिति क्यों पैदा हो रही है बल्कि आज हम इस बारे में जानकारी देने वाले है कि अमेरिका की करेंसी डॉलर को ही वैश्विक मुद्रा का दर्जा प्राप्त क्यों है यानी कि किसी भी देश की करेंसी को डॉलर के साथ ही क्यों मापा जाता है? क्या इसकी वजह ये है कि अमेरिका इस समय दुनिया का सबसे विकसित देश है या फिर कोई ओर वजह है चलिए आपको बताते है।

Why the Dollar is the Global Currency

Why the Dollar is the Global Currency

आख़िर डॉलर क्यों है ग्लोबल करेंसी? – Why the Dollar is the Global Currency

डॉलर आज के समय में एक वैश्विक मुद्रा – Global Currency बन गई है। जिसकी एक बड़ी वजह ये है कि दुनियाभर के केंद्रीय बैंको में अमेरिकी डॉलर स्वीकार्य है। और रिपोर्टस की माने तो दुनियाभर में देशों के बीच दिए जाने वाले 39 फीसदी कर्ज डॉलर में ही दिए जाते है। हालांकि डॉलर को हमेशा से वैश्विक मुद्रा का दर्जा प्राप्त नहीं था।

साल 1944 से पहले गोल्ड को मानक माना जाता था। यानी की दुनियाभर के देश अपने देश की मुद्रा को सोने की मांग मूल्य के आधार पर ही तय करते थे। लेकिन साल 1944 में ब्रिटेन में वुड्स समझौता हुआ। जिसमें ब्रिटेन के वुड्स शहर में दुनियाभर के विकसित देशों की एक बैठक आख़िर डॉलर कैसे बना दुनिया की सबसे मज़बूत मुद्रा हुई जिसमें ये तय किया गया कि अमरीकी डॉलर के मुकाबले सभी मुद्राओँ की विनिमय दर तय की जाएगी।

ऐसा इसलिए क्योंकि उस समय अमेरिका के पास दुनिया में सबसे ज्यादा सोने के भंडार थे। जिस वजह से बैठक मे शामिल हुए दूसरे देशों ने भी सोने की जगह डॉलर को वैश्विक मुद्रा बनाने और डॉलर के अनुसार उनकी मुद्रा का तय करने की अनुमति दी।

हालांकि इसके बाद कई बार डॉलर की जगह दोबारा सोने को मानक मांग उठाने की आवाज उठी। जिसमें से पहली आवाज साल 1970 में उठी जिसमें कई देशों ने मांग रखी कि डॉलर की जगह सोने को मांग शुरु कर दी थी। क्योंकि वो मुद्रा स्फीति से लड़ना चाहते थे। उस समय के अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन ने स्थिति को देखते हुए डॉलर को सोने से ही अलग कर दिया था।

लेकिन तब तक डॉलर विश्व बाजार में अपनी पहचान बना चुका था। जिसमें लोगों के लिए विनमय करना सबसे सुरक्षित था। यही कारण है कि आज के समय में दुनिया भर के केंद्रीय बैंको में 64 प्रतिशत मुद्रा डॉलर में है। हालांकि डॉलर के वैश्विक मुद्रा होने का एक मुख्य कारण ये भी है कि उसकी अर्थव्यवस्था इस समय दुनिया की सबसे मजबूत अर्थव्यवस्था है। अगर रिपोर्टस की बात करें तो इंटरनेशनल स्टैंडर्ड ऑर्गनाइजेंशन के अनुसार दुनियाभर में 185 करेंसियों का संचालन है।

लेकिन इनमें से ज्यादातर करेंसी केवल अपने देश तक ही सीमित है यानी की वो किसी ओर देश में नहीं चलती है। जिस कारण वैश्विक स्तर पर होने वाला 80 प्रतिशत व्यापार डॉलर में ही किया जाता है।

क्या डॉलर का कोई विकल्प है

डॉलर के बाद जो करेंसी दुनियाभर सबसे ज्यादा मान्य है वो है यूरो, ऐसा इसलिए क्योंकि अमेरिका की ही तरह यूरोपीय यूनियन भी दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थों में से एक है। दुनियाभर के केंद्रीय बैंको में डॉलर के बाद सबसे ज्यादा करेंसी यूरो है। बैंको में 19.9 प्रतिशत यूरो का भंडार है। साथ ही दुनियाभर के कई देशों यूरो को काफी इस्तेमाल किया जाता है।

हालांकि चीन और रुस जैसे बड़े देश भी अपनी करेंसी को वैश्विक करेंसी बनाने की पूर्जोर मेहनत कर रहे है। ऐसा इसलिए क्योंकि ऐसा होने से उनके देश की आर्थिक स्थिति ओर भी मजबूत हो जाएगी। जिस कारण चीन काफी समय से नई वैश्विक मुद्रा की मांग उठा रहा है। और शायद चीन आने वाले समय में कामयाब भी हो जाए क्योंकि साल 2016 में चीन की करेंसी यूआन दुनिया की डॉलर और यूरो के बाद एक ओर बड़ी करेंसी बनकर उभरी थी ।जिस वजह से चीन लगातार अपनी अर्थव्यवस्था को सुधारने में लगा हुआ हैं।

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