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हमारे बारे में

'अहं पी ए एम एम लेखा राष्ट्री संगमनी वसूनाम् के सूत्र वाक्य के साथ 1 मार्च, 1960 को शिक्षा मंत्रालय (वर्तमान में उच्चतर शिक्षा विभाग, शिक्षा मंत्रालय) के अधीन केंद्रीय हिंदी निदेशालय की स्थापना हुई। हिंदी को अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान करने, हिंदी के माध्यम से जन-जन को जोड़ने और हिंदी को वैश्विक धरातल पर प्रतिष्ठित करने के लिए निरंतर प्रयासरत यह हिंदी की शीर्षस्थ सरकारी संस्था है।

भारतीय संविधान के भाग 17 के अनुच्छेद 351 में हिंदी भाषा के विकास हेतु स्पष्ट निर्देश है:

"संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे ताकि वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सकें तथा उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिंदुस्तानी के और आठवी अनुसूची में विनिर्दिष्‍ट भारत की अन्य भारतीय भाषाओं के प्रयुक्‍त रूप, शैली और पदों को आत्मसात् करते हुए तथा जहाँ आवश्यक या वाँछनीय हो वहाँ उसके शब्द-भंडार के लिए मुख्यत: संस्कृत से तथा गौणत: अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करे।'' संविधान की इसी भावना और विशेष निर्देशों के अनुपालन हेतु केंद्रीय हिंदी निदेशालय का जन्म हुआ।

हरीश-चन्द्र (एक परिचय)

Harish-Chandra

प्रो. हरीश-चन्द्र का जन्म 11 अक्टूबर, 1923 को भारत में उत्तर प्रदेश के औद्योगिक नगर कानपुर में हुआ। वह उन्नीसवीं शदाब्दी के प्रमुख गणितज्ञों में से एक थे। प्रो. हरीश-चन्द्र का निधन 16 अक्टूबर, 1983 को अमेरिका के प्रिंस्टन, न्यू जर्सी में हुआ। प्रो. हरीश-चन्द्र का निम्नलिखित जीवन-वृत्त MacTutor History of Mathematics Archive, सेंट एंड्र्यू विश्वविद्यालय, स्कॉटलैंड से उद्धरित है जो जे.ओ. कोन्नोर तथा एडमंड एफ द्वारा लिखा गया था।

संक्षिप्त जीवन-वृत्त

प्रो. हरीश-चन्द्र की प्रारंभिक शिक्षा कानपुर में हुई। फिर उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से सैद्धांतिक भौतिकी विज्ञान में उच्च शिक्षा प्राप्त की। इसके पश्चात् उन्होंने क्वांटम यांत्रिकी पर पॉल डिराक के विनिबंध [ Dir30] का अध्ययन किया। उन्होंने 1943 में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की तथा सैद्धांतिक भौतिकी में कार्य करने के लिए वे बंगलौर चले गये।

कुछ दिनों बाद, हरीश-चन्द्र कैम्ब्रिज चले गये जहाँ उन्होंने डिराक के मार्गदर्शन में पी.एच.डी. किया। कैम्ब्रिज प्रवास के दौरान उन्हें भौतिकी विज्ञान से हटकर गणित में अधिक रूचि हो गई। कैम्ब्रिज में ही वे पाउली के व्याख्यान में उपस्थित हुए तथा उन्होंने पाउली के कार्य में हुई गलती को उजागर किया। इसके बाद से जीवन भर वे दोनों मित्र रहे। प्रो. हरीश-चन्द्र 1947 में डिग्री पी ए एम एम लेखा प्राप्त कर अमेरिका चले गये।

डिराक एक वर्ष के लिए प्रिंस्टन आये तथा इस अवधि में हरीशचन्द्र ने उनके सहायक के रूप में कार्य किया। यद्यपि, वह गणितज्ञ हर्मन वेल तथा क्लाउड चेवेली से काफी प्रभावित थे। 1950-1965 की अवधि उनके लिए काफी उपयोगी रहा। यह अवधि उन्होंने कोलम्बिया विश्वविद्यालय में बितायी। इस अवधि में उन्होंने सेमी-सिम्पल ली ग्रुप के निरूपण पर कार्य किया। इसी अवधि में वे आंड्रे विल के संपर्क में भी रहे।

प्रो. हरीश-चन्द्र, एक उद्धरण के अनुसार [Lan85], विश्वास करते थे कि गणित में उनकी पृष्ठभूमि की कमी, एक तरह से, उनके कार्य में अनूठेपन के लिए जिम्मेदार थी :

"मैंने प्राय: खोज की प्रक्रिया में एक ओर ज्ञान या अनुभव की भूमिका तथा दूसरी ओर कल्पना या अंत:प्रज्ञा की भूमिका पर चिंतन किया है। मुझे विश्वास है कि इन दोनों के बीच कुछ मौलिक अंतर्विरोध हैं तथा ज्ञान, सावधानी पूर्वक विचार करने पर, कल्पना की उड़ान में बाधा उत्पन्न करती है। इसलिए पारंपरिक विवेक द्वारा भारमुक्त अनुभवहीनता कभी- कभी सकारात्मक मूल्य के हो सकते हैं। "

प्रो. हरीश-चन्द्र 1963 में प्रिंसटन में इंस्टीटयूट फॉर एडवांस स्टडी में कार्य किया। वे 1968 में आई.बी.एम. वान न्यूमैन प्रोफेसर नियुक्त हुए।

प्रिंसटन में एक सम्मेलन के दौरान दिल का दौरा पड़ने से प्रो. हरीश-चन्द्र का निधन हो गया।

प्रो. हरीश-चन्द्र अपने जीवन में कई पुरस्कारों से सम्मानित किये गये। वे रॉयल सोसाइटी, लंदन तथा राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी के सदस्य थे। सेमी-सिम्पल ली अल्जेब्रा एवं ग्रुप के निरूपण तथा अपने विशेष पत्र [Har51] की प्रस्तुति के लिए उन्हें सन् 1954 में अमेरिकन मैथेमेटिकल सोसाइटी द्वारा कोल पुरस्कार प्रदान किया गया। 1974 में उन्हें भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी (INSA) द्वारा श्रीनिवास रामानुजन मेडल से सम्मानित किया गया।

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Gandhi

"अगर मुझे विश्वास है कि मैं ऐसा कर सकता हूं, तो मैं निश्चित रूप से यह करने की क्षमता हासिल करूंगा, भले ही शुरू पी ए एम एम लेखा में मेरे पास वो क्षमता ना रही हो ।"

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