नई दिल्ली , कृषि , समुद्री उत्पाद , कालीन , हस्तशिल्प और वस्त्र जैसे श्रम बाहुल्य वाले क्षेत्र से निर्यातकों को रुपये के अवमूल्यन के कारण सर्वाधिक लाभ प्राप्त होगा तथा अधिकांश के लिए हेजिंग की लागत सर्वाधिक होगी और साथ ही अपनी मुद्रा के अवमूल्यन के कारण चीन लाभ की स्थिति में होगा। निर्यातकों ने मंगलवार को पीटीआई को बताया कि रत्न एवं आभूषण , इलेक्ट्रानिक्स एवं महंगे इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्र रुपये के अवमूल्यन से लाभान्वित नहीं होंगे। ये क्षेत्र कच्चे माल के लिए आयात पर निर्भर करते हैं। निर्यातकों के संग”न फियो के महानिदेशक अजय सहाय ने कहा , w महत्वपूर्ण लाभ अर्जित करने वाले क्षेत्रों में कृषि , समुद्री उत्पाद , कालीन , हस्तशिल्प और वस्त्र जैसे पारंपरिक निर्यात क्षेत्र शामिल होंगे। हालांकि रत्न एवं आभूषण , इलेक्ट्रानिक्स एवं महंगे रसायन जैसे क्षेत्रों पर सीमित प्रभाव होगा। इन क्षेत्रों की आयात पर अधिक निर्भरता है। w इस बीच रुपया आज अमेरिकी मुद्रा के मुकाबले 55 पैसे की तेजी के साथ 66.10 रुपये प्रति डॉलर पर बंद हुआ। कल रुपया 82 पैसे की गिरावट के साथ 66.65 रुपये प्रति डॉलर पर बंद हुआ था। भारतीय वस्त्र उद्योग परिसंघ के महासचिव डी के नायर ने कहा , w हालांकि समस्या यह है कि हमारा सबसे बड़ा प्रतिस्पर्धी देश चीन है। भारत के वस्त्र निर्यातक चीन से पिछड़ सकते हैं जिसकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता कहीं अधिक है। हस्तशिल्प निर्यात मुद्रा अवमूल्यन का प्रभाव संवर्धन परिषद के पूर्व अध्यक्ष राज कुमार मल्होत्रा ने कहा , w स्वाभाविक तौर पर हस्तशिल्प निर्यातक लाभान्वित होंगे। हालांकि आयात महंगा होगा , कच्चे माल की लागत बढ़ेगी , इसके बावजूद निर्यात की मांग बढ़ेगी। इसलिए निर्यातकों को लागत लाभ 50 प्रतिशत का होगा। w उन्होंने कहा कि निर्यातकों के लिए हेजिंग लागत को भी बढ़ाया जायेगा। रत्न एवं आभूषण निर्यात संवर्धन परिषद के अध्यक्ष विपुल शाह ने कहा , w रत्न एवं आभूषण निर्यातकों पर अवमूल्यन का कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं होगा। हालांकि कच्चे माल की लागत बढ़ेगी। ईईपीसी इंडिया के अध्यक्ष अनुपम शाह ने कहा , w मुझे नहीं लगता कि हमें अधिक सकारात्मक प्रभाव देखने को मिलेगा क्योंकि हमारा निर्यात प्रतिस्पर्धी नहीं है तथा चीनी मुद्रा का अवमूल्यन भी किया गया है। w इसके अलावा सरकार द्वारा महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने के लिए संसद के मानसून सत्र को फिर से बुलाने के इरादे को जताने के बीच सेंसेक्स कल दर्ज हुई अब तक की सबसे बड़ी गिरावट के बाद आज उतार चढ़ाव भरे कारोबार में 290 अंक की तेजी के साथ 26,000 अंक के स्तर को फिर से हासिल करने में सफल रहा। निफ्टी में करीब 71 अंक की तेजी आई।

ईरान की मुद्रा के नाम और मूल्य-वर्ग में परिवर्तन के निहितार्थ

(प्रारम्भिक परीक्षा: राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाएँ)
(मुख्य परीक्षा: सामान्य अध्ययन, प्रश्नपत्र-2: भारत के हितों पर विकसित तथा विकासशील देशों की नीतियों तथा राजनीति का प्रभाव; प्रवासी भारतीय)

चर्चा में क्यों?

ईरान की सरकार ने अपनी मुद्रा (रियाल) के नाम परिवर्तन तथा उसके मूल्य-वर्ग में बदलाव का निर्णय लिया है।

पृष्ठभूमि

ईरान ने दिसम्बर 2016 में भी तत्कालीन मुद्रा ‘रियाल’ (Rial) के नाम और मौद्रिक-मूल्य (Monetary Value) में बदलाव प्रस्तावित किया था। उल्लेखनीय है कि वर्ष 1930 से पूर्व ईरानी मुद्रा का मुद्रा अवमूल्यन का प्रभाव नाम ‘तोमन’ (Toman) हुआ करता था, 1930 के बाद नाम बदलकर ‘रियाल’ कर दिया गया। उस समय एक तोमन का मूल्य 10 रियाल के बराबर निर्धारित किया गया था। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund-IMF) के अनुसार, वर्तमान में विभिन्न देशों द्वारा किया जाने वाला मुद्रा अवमूल्यन वैश्विक व्यापार में तनावों का केंद्र-बिंदु बन गया है।

डॉलर के मुकाबले रुपये ने छुआ रिकॉर्ड निचला स्‍तर; क्‍यों टूट रही है भारतीय करंसी, आप पर कैसे होगा असर?

Rupee hitting an all-time low: डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 17 मई 2022 को 77.69 के रिकॉर्ड लो तक पहुंच गया. हालांकि, घरेलू बाजारों में तेजी के दम पर आखिर में 7 पैसे की मजबूती लेकर 77.47 पर बंद हुआ.

Rupee hitting an all-time low: भारतीय रुपया आज (17 मई 2022) शुरुआती कारोबारी सेशन में ही अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्‍तर पर आ गया. रुपया 14 पैसे गिरकर 77.69 के लेवल पर पहुंच गया. इससे पहले मार्च में डॉलर के मुकाबले रुपये ने 76.98 का रिकॉर्ड लो बनाया था. हालांकि, घरेलू शेयर बाजारों में तेजी के दम पर सत्र के आखिर में 7 पैसे की मजबूती लेकर 77.47 मुद्रा अवमूल्यन का प्रभाव पर बंद हुआ. रुपये में लगातार आ रही कमजोरी अर्थव्‍यवस्‍था के लिए अच्‍छे संकेत नहीं हैं. एक्‍सपर्ट मानते हैं कि रुपये में गिरावट यानी अवमूल्यन का सीधा असर हमारे खर्च पर पड़ेगा. आयातित सामानों के साथ तेल आयात भी महंगा हो सकता है. वहीं, विदेशी निवेशक घरेलू इक्विटी मार्केट से दूरी बना सकते हैं. ऐसे में यह अहम सवाल है कि क्‍या रुपये में गिरावट से हमें चिंतित होने की जरूरत है? वहीं, रिजर्व बैंक पर भी नजर रहेगी कि वह रुपये को सपोर्ट देने के लिए क्‍या कदम उठाता है.

क्‍यों कमजोर हो रहा मुद्रा अवमूल्यन का प्रभाव है रुपया?

मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज के फॉरेक्‍स एंड बुलियन एनॉलिस्‍ट गौरांग सोमैया का कहना है, डॉलर में आ रही मजबूती और ग्‍लोबल क्रूड कीमतों में तेजी के चलते रुपये में मुद्रा अवमूल्यन का प्रभाव लगातार गिरावट है. पिछले हफ्ते घरेलू मोर्चे और अमेरिका में महंगाई के आंकड़ों ने बाजार का सेंटीमेंट और बिगाड़ दिया है. सोमैया का कहना है कि अमेरिकी डॉलर में अभी मजबूती बने रहने की उम्‍मीद है और यह 77.40 से 78.20 के रेंज में रह सकता है.

इन्‍वेस्‍टमेंट कंसल्टिंग फर्म मिलवुड केन इंटरनेशनल के फाउंडर एंड सीईओ निश भट्ट का कहना है कि बीते एक साल में करीब 6 फीसदी कमजोर हो चुका है. यह अभी और टूट सकता है. डॉलर इंडेक्‍स में मजबूती और ग्‍लोबल इकोनॉमिक ग्रोथ में अनिश्चितता के चलते रुपये ने नया ऑल टाइम लो बनाया है.

उनका कहना है कि दुनियाभर से कमजोर आर्थिक आ रहे हैं. खासकर चीन ने डॉलर इंडेक्‍स पर दबाव बढ़ाया और यह ढाई साल के हाई पर पहुंच गया. घरेलू स्‍तर पर देखें तो निवेशक ज्‍यादा रिटर्न के लिए घरेलू बाजार से पैसा निकाल रहे हैं. अमेरिका में ब्‍याज दरें बढ़ती हैं, तो यह आउटफ्लो और बढ़ेगा. महंगाई के बढ़ने के चलते आरबीआई ब्‍याज दरें बढ़ाता है, तो भारतीय करंसी पर दबाव और बढ़ेगा.

बता दें, अमेरिका में मॉनिटरी पॉलिसी के सख्त होने की उम्मीद से भी रुपये पर असर पड़ा है. ऐसा इसलिए क्योंकि विकसित बाजारों में किसी भी तरह की ग्रोथ के चलते आमतौर पर इमर्जिंग मार्केट से फंड का आउटफ्लो होता है. हाई रिटर्न के लिए निवेशक पैसा निकालकर ज्‍यादा ब्‍याज दरों वाले मार्केट में पैसा लगाते हैं. वहीं, दुनियाभर के केंद्रीय बैंकों की ओर से सामान्य नीति शुरू करने के बाद रुपये पर दबाव रहा है और पिछले हफ्ते आरबीआई ने भी प्रमुख ब्याज दरों में इजाफा करना शुरू कर दिया था.

रुपये को संभालने के लिए RBI क्‍या करेगा?

सेबी रजिस्‍टर्ड इन्‍वेस्‍टमेंट एडवाइजरी फर्म तेजी मंदी के फाउंडर वैभव अग्रवाल का कहना है, दुनिया अभी-अभी महामारी से बाहर आई है, हम पहले से ही महंगाई से जूझ रहे हैं और आरबीआई ने हाल ही में रेपो दरों में बढ़ोतरी कर दी है, जिससे सब कुछ अधिक महंगा हो गया है. महामारी के दौरान, यूएस फेड ने लोगों और अर्थव्यवस्था की मदद के लिए करेंसी की छपाई की थी. इस अमेरिकी पैसे ने भारतीय बाजारों में अपनी जगह बनाई. 2021 में विदेशी निवेश के जरिए लगभग 30 अरब डॉलर घरेलू बाजार में आए. अब, अमेरिका महंगाई को काबू करने के लिए उस लिक्विडिटी को खिंचने के लिए ब्याज दरें बढ़ा रहा है.

अग्रवाल का कहना है, आरबीआई ने इस दौरान 640 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार बना लिया. अगर रुपये में भारी गिरावट आती है, तो आरबीआई इनमें से कुछ भंडार बेचकर स्थिति को नियंत्रित कर सकता है. रुपये को सुरक्षित रखने के लिए आरबीआई ने स्पॉट मार्केट में कुछ डॉलर्स बेचे हैं. हालांकि, जब तक यूक्रेन-रूस युद्ध समाप्त नहीं हो जाता और चीन में कोविड-19 के मामले कम नहीं हो जाते, तब तक रुपये में उतार-चढ़ाव बना रहेगा. यह देखना दिलचस्प होगा कि गिरते रुपये को बचाने के लिए आरबीआई कितना फॉरेक्स बेचेगा.

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कमजोर रुपया आप पर कैसे डालेगा असर?

वैभव अग्रवाल का कहना है, रुपये के गिरावट का सीधा असर हमारे खर्च पर पड़ेगा. तेल समेत इम्‍पोर्ट होने वाले सभी सामान महंगे हो सकते हैं. रेपो रेट बढ़ने के बाद बैंक कर्ज महंगा करेंगे, जिससे लोन की EMI बढ़ जाएंगी. रुपये के कमजोर होने से कार, फोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामान महंगे हो जाएंगे. आखिर में इसका असर इक्विटी बाजार भी पड़ सकता है. विदेशी निवेशक घरेलू इक्विटी मार्केट से और दूरी बना सकते हैं.

अग्रवाल का कहना है, शांघाई में बढ़ते कोविड-19 मामलों ने येन और इमर्जिंग मार्केट्स को प्रभावित किया है, जिसमें भारत भी शामिल है. बाजारों ने चीनी सरकारों की 'जीरो-कोविड पॉलिसी' मुद्रा अवमूल्यन का प्रभाव को ग्‍लोबल ग्रोथ के लिए एक बड़े जोखिम के रूप में देखा है. लॉकडाउन के प्रभाव को अप्रैल में चीन की एक्‍सपोर्ट ग्रोथ सिंगल डिजिट में सिमट गई थी. क्योंकि कोविड प्रतिबंधों के चलते कारखाने के उत्पादन ठप हो गया था. सप्‍लाई चेन बाधित थी और घरेलू मांग में गिरावट आ गई थी. पीपल्स बैंक ऑफ चाइना के किसी भी फैसले से सेंटीमेंट में मुद्रा अवमूल्यन का प्रभाव सुधार होगा, जिससे भारतीय रुपये को भी मदद मिलेगी.

‘इस्लाम मुझे इजाजत नहीं…’ एर्दोगन ने तुर्की की चरमराती अर्थव्यवस्था को बचाने से इनकार कर दिया

'खलीफा' बनने के चक्कर में एर्दोगन ने तुर्की को बर्बादी के कगार पर पहुंचा दिया है!

अवमूल्यन

तुर्की की मुद्रा लीरा का अवमूल्यन और तेजी से आगे बढ़ रहा है। इसी बीच तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन के एक बयान ने देश की अर्थव्यवस्था को नीचे तक हिला दिया है। तुर्की की आर्थिक हालात इन दिनों बेहद कमजोर है। राष्ट्रपति एर्दोगन ने अपने संबोधन में कहा है कि इस्लाम में कम ब्याज लेने या फिर ब्याज ना लेने की बात कही गई है, इसलिए वो ब्याज दरों को नहीं बढ़ाएंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि तुर्की की आर्थिक नीति इस्लामिक कानूनों के अनुरूप ही बनी रहेगी। एर्दोगन के इस बयान के बाद तुर्की की नेशनल करेंसी लीरा में डॉलर के मुकाबले लगभग 6 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।

क्या है अवमूल्यन का अर्थशास्त्र?

अर्थव्यवस्था का बहुत सरल सिद्धांत है कि जब मुद्रा का अवमूल्यन होता है, तो ब्याज दरों को बढ़ाया जाता है। अन्य मुद्राओं के संबंध में अवमूल्यन एक मुद्रा के मूल्य में कमी है। अवमूल्यन मुद्रा के संदर्भ में कीमतों में वृद्धि से देश में आयात की घरेलू मांग को कम करने तथा विदेशी मुद्राओं के संदर्भ में उनकी कीमतों को कम करके देश के निर्यात के लिए विदेशी मांग को बढ़ाने का प्रयास करता है। इससे देश की मुद्रा के आंतरिक मूल्य (क्रय शक्ति) पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, किंतु विदेशी मुद्रा की तुलना में वह सस्ती हो जाती है। मौजूदा समय में तुर्की के साथ भी यही हुआ है। तुर्की की मुद्रा लीरा 6 फीसदी से अधिक कमजोर होकर 17.624 प्रति डॉलर पर आ गई है।

जब बाजार में अवमूल्यन शुरू होता है, तो सरकार की जिम्मेदारी होती है कि बाजार से मुद्रा कम करे। इसका तरीका है, लोगों को प्रोत्साहित किया जाए कि पैसे बैंक में जमा करें। इसके लिए ब्याज देना पड़ेगा, जिससे लोगों में उत्साह बढ़ेगा और बैंकों में ज्यादा पैसे जमा हो पाएंगे। लेकिन इस्लामिक कानून के अनुसार ब्याज लेना और देना गुनाह है। राष्ट्रपति एर्दोगन अपनी जिद के कारण अर्थव्यवस्था के मूल नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं। इस कारण तुर्की की मुद्रा लीरा की कीमत लगातार घटते जा रही है।

तुर्की में बढ़ रही है कॉस्ट ऑफ लिविंग

तुर्की में लीरा का मूल्य घटने से वस्तुओं की कीमत में बढ़ोत्तरी देखने को मिल रही है। तुर्की में सामान्य व्यक्ति का जीवन कठिन हो रहा है, क्योंकि बढ़ती महंगाई ने कॉस्ट ऑफ लिविंग बढ़ाई है। सऊदी अरब जैसे देशों ने लंबे समय से कम ब्याज का मॉडल अपनाया है, लेकिन उनके पास अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए लगातार मिलने वाली विदेशी मुद्रा है। तेल खरीदार देश उन्हें लगातार डॉलर की आपूर्ति करते रहे हैं। तेल के व्यापार के लाभ का प्रयोग लोगों को सब्सिडी देने में किया जाता है। सऊदी अरब अपने निवासियों को भत्ते देता है। वर्ष 2018 में सीधे तौर पर स्थानीय लोगों को 13 बिलियन डॉलर की आर्थिक मदद दी गई थी, जिससे वह खरीदारी कर सकें।

लेकिन सऊदी अरब की तरह ही तुर्की लोगों को आर्थिक मदद नहीं दे सकता, क्योंकि वह सऊदी अरब की तरह तेल निर्यातक देश नहीं है और न ही चीन या भारत की तरह मैन्युफैक्चरिंग हब मुद्रा अवमूल्यन का प्रभाव है। तुर्की व्यक्तिगत पेंशन पर सब्सिडी 5 फीसदी से बढ़ाकर 30 फीसदी करने की योजना बना रहा है, लेकिन इसका लाभ थोड़े समय तक ही होगा। तुर्की को यदि अपनी अर्थव्यवस्था को डूबने से बचाना है, तो उसे अपनी आर्थिक नीतियों में बदलाव करना होगा। लेकिन तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन का खलीफा बनने का सपना, तुर्की के आम लोगों को दवाई, भोजन, बिजली आदि सब महंगे दामों पर खरीदने पर विवश कर रही है।

रुपये की गिरावट से श्रम आधारित क्षेत्रो में कालीन को काफी लाभ के निर्यातकों को सर्वाधिक लाभ

नई दिल्ली , कृषि , समुद्री उत्पाद , कालीन , हस्तशिल्प और वस्त्र जैसे श्रम बाहुल्य वाले क्षेत्र से निर्यातकों को रुपये के अवमूल्यन के कारण सर्वाधिक लाभ प्राप्त होगा तथा अधिकांश के लिए हेजिंग की लागत सर्वाधिक होगी और साथ ही अपनी मुद्रा के अवमूल्यन के कारण चीन लाभ की स्थिति में होगा। निर्यातकों ने मंगलवार को पीटीआई को बताया कि रत्न एवं आभूषण , इलेक्ट्रानिक्स एवं महंगे इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्र रुपये के अवमूल्यन से लाभान्वित नहीं होंगे। ये क्षेत्र कच्चे माल के लिए आयात पर निर्भर करते हैं। निर्यातकों के संग”न फियो के महानिदेशक अजय सहाय ने कहा , w महत्वपूर्ण लाभ अर्जित मुद्रा अवमूल्यन का प्रभाव करने वाले क्षेत्रों में कृषि , समुद्री उत्पाद , कालीन , हस्तशिल्प और वस्त्र जैसे पारंपरिक निर्यात क्षेत्र शामिल होंगे। हालांकि रत्न एवं आभूषण , इलेक्ट्रानिक्स एवं महंगे रसायन जैसे क्षेत्रों पर सीमित प्रभाव होगा। इन क्षेत्रों की आयात पर अधिक निर्भरता है। w इस बीच रुपया आज अमेरिकी मुद्रा के मुकाबले 55 पैसे की तेजी के साथ 66.10 रुपये प्रति डॉलर पर बंद हुआ। कल रुपया मुद्रा अवमूल्यन का प्रभाव 82 पैसे की गिरावट के साथ 66.65 रुपये प्रति डॉलर पर बंद हुआ था। भारतीय वस्त्र उद्योग परिसंघ के महासचिव डी के नायर ने कहा , w हालांकि समस्या यह है कि हमारा सबसे बड़ा प्रतिस्पर्धी देश चीन है। भारत के वस्त्र निर्यातक चीन से पिछड़ सकते हैं जिसकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता कहीं अधिक है। हस्तशिल्प निर्यात संवर्धन परिषद के पूर्व अध्यक्ष राज कुमार मल्होत्रा ने कहा , w स्वाभाविक तौर पर हस्तशिल्प निर्यातक लाभान्वित होंगे। हालांकि आयात महंगा होगा , कच्चे माल की लागत बढ़ेगी , इसके बावजूद निर्यात की मांग बढ़ेगी। इसलिए निर्यातकों को लागत लाभ 50 प्रतिशत का होगा। w उन्होंने कहा कि निर्यातकों के लिए हेजिंग लागत को भी बढ़ाया जायेगा। रत्न एवं आभूषण निर्यात संवर्धन परिषद के अध्यक्ष विपुल शाह ने कहा , w रत्न एवं आभूषण निर्यातकों पर अवमूल्यन का कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं होगा। हालांकि कच्चे माल की लागत बढ़ेगी। ईईपीसी इंडिया के अध्यक्ष अनुपम शाह ने कहा , w मुझे नहीं लगता कि हमें अधिक सकारात्मक मुद्रा अवमूल्यन का प्रभाव प्रभाव देखने को मिलेगा क्योंकि हमारा निर्यात प्रतिस्पर्धी नहीं है तथा चीनी मुद्रा का अवमूल्यन भी किया गया है। w इसके अलावा सरकार द्वारा महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने के लिए संसद के मानसून सत्र को फिर से बुलाने के इरादे को जताने के बीच सेंसेक्स कल दर्ज हुई अब तक की सबसे बड़ी गिरावट के बाद आज उतार चढ़ाव भरे कारोबार में 290 अंक की तेजी के साथ 26,000 अंक के स्तर को फिर से हासिल करने में सफल रहा। निफ्टी में करीब 71 अंक की तेजी आई।

फिक्की के महासचिव ए दीदार सिंह ने कहा , w सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक दोनों स्थिति पर करीबी नजर रखे हैं और हमें उम्मीद है कि यह विकासक्रम हमें सुधार प्रक्रियाओं को तेज करने , भारतीय अर्थव्यवस्था को मुद्रा अवमूल्यन का प्रभाव अधिक गतिमान बनाने तथा आंतरिक दबाव झेलने लायक बनाने में मदद करेगा।

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मुद्रा प्रशंसा और मूल्यह्रास

मुद्रा मूल्यह्रास एक या एक से अधिक विदेशी संदर्भ मुद्राओं के संबंध में किसी देश की मुद्रा के मूल्य का नुकसान है , आमतौर पर एक अस्थायी विनिमय दर प्रणाली में जिसमें कोई आधिकारिक मुद्रा मूल्य नहीं रखा जाता है। उसी संदर्भ में मुद्रा की सराहना मुद्रा के मूल्य में वृद्धि है। मुद्रा के मूल्य में अल्पकालिक परिवर्तन विनिमय दर में परिवर्तन में परिलक्षित होते हैं । [१] [२] [३] [४]

एक अस्थायी विनिमय दर प्रणाली में, एक मुद्रा का मूल्य ऊपर (या नीचे) जाता है यदि इसकी मांग आपूर्ति की तुलना में अधिक (या कम) हो जाती है। अल्पावधि में यह कई कारणों से अप्रत्याशित रूप से हो सकता है, जिसमें व्यापार संतुलन , सट्टा या अंतरराष्ट्रीय पूंजी बाजार में अन्य कारक शामिल हैं । उदाहरण के लिए, घरेलू देश के निवासियों द्वारा विदेशी वस्तुओं की खरीद में वृद्धि से विदेशी मुद्रा की मांग में वृद्धि होगी जिसके साथ उन सामानों का भुगतान करना होगा, जिससे घरेलू मुद्रा का मूल्यह्रास होगा।

एक मुद्रा की प्रशंसा (या मूल्यह्रास) का एक अन्य कारण इस विश्वास में धन की सट्टा चाल है कि एक मुद्रा कम है- (या अधिक-) मूल्यवान और "सुधार" की प्रत्याशा में। इस तरह के आंदोलनों से अपने आप में एक मुद्रा का मूल्य बदल सकता है।

लंबे समय तक चलने वाली क्रय शक्ति समता के सिद्धांत के अनुसार, अन्य देशों में मुद्रास्फीति की तुलना में घरेलू देश की मुद्रास्फीति औसतन कम (या अधिक) होने के कारण प्रशंसा (या मूल्यह्रास) की लंबी अवधि की प्रवृत्ति होने की संभावना है । [३]

जब किसी देश की मुद्रा विदेशी मुद्राओं के संबंध में बढ़ती है, तो घरेलू बाजार में विदेशी सामान सस्ता हो जाता है और घरेलू कीमतों पर समग्र रूप से नीचे का दबाव होता है। इसके विपरीत, विदेशियों द्वारा भुगतान की जाने वाली घरेलू वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाती हैं, जिससे घरेलू उत्पादों की विदेशी मांग में कमी आती है।

घरेलू मुद्रा के मूल्यह्रास का विपरीत प्रभाव पड़ता है। इस प्रकार, एक मुद्रा का मूल्यह्रास विदेशी बाजारों में घरेलू सामानों की प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार करके देश के व्यापार संतुलन (निर्यात घटा आयात) को बढ़ाता है, जबकि घरेलू बाजार में विदेशी वस्तुओं को कम प्रतिस्पर्धी बनाकर और अधिक महंगा बना देता है।

में अंतरराष्ट्रीय पूंजी बाजार , एक मुद्रा के मूल्य में बदलाव एक को जन्म दे सकता विदेशी मुद्रा लाभ या हानि । घरेलू मुद्रा के मूल्यवृद्धि से उस मुद्रा में मूल्यवर्ग के वित्तीय लिखतों का मूल्य बढ़ जाता है , जबकि ऋण लिखतों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है । [३]

मुद्रा मूल्यवृद्धि और मूल्यह्रास की भविष्यवाणी करने के लिए, व्यापारी आर्थिक कैलेंडर का उपयोग करते हैं । कैलेंडर में आर्थिक रिलीज शामिल हैं जो अर्थव्यवस्था की ताकत और कमजोरियों को निर्धारित करती हैं। इस प्रकार, यदि कोई व्यापारी केवल यह जानता है कि जिस देश की मुद्रा में वह व्यापार करता है उसकी जीडीपी वृद्धि पूर्वानुमान की तुलना में घट गई है, तो वह घरेलू मुद्रा के गिरने की उम्मीद कर सकता है। [५]

साथ ही, केंद्रीय बैंक की मौद्रिक नीति के बारे में बात करते समय शब्दों का उपयोग किया जाता है । केंद्रीय बैंक एक अकेला प्राधिकरण है जो पैसा जारी करता है। इस प्रकार, इसकी नीति का घरेलू मुद्रा पर प्रभाव पड़ता है: यदि केंद्रीय बैंक ब्याज दर बढ़ाता है , या देश की अर्थव्यवस्था पर आशावादी टिप्पणी देता है, तो घरेलू मुद्रा की सराहना होती है। यदि बैंक ब्याज दर में कटौती करता है या अर्थव्यवस्था के लिए समस्याओं का संकेत देता है, तो घरेलू मुद्रा का मूल्यह्रास होता है। [6]

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